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शुंकरानन्द टोका भाषानुवाद सहितः |
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ॐ पूर्णमदः quire पूर्णात्ूणेमदुच्यते | पूणस्य पूर्णमादाय पूणमेवावशिष्यते ॥ १ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
केवल्याछयोपनिषद केवल्यार्थवबोधिनीम् |
व्याख्यास्ये केवक्षस्तेन केतल्यारमाघ्रसीदतु।१॥ अथाश्वल्ायनो भगवन्तं परमेिनं परि-
समेत्योवाच अधीहि भगवन्ब्रह्मविह्यां afisi
लदा सद्भिः सेव्यमानां निगूढां ययाचिरात्संवे
पापं sada परात्परं पुरुषपुपेति विद्वान् || भगवती श्रतिः मातेव सुखप्रतिपत्यथ कञ्चना- श्वलायनसुररीं कृत्य निमितीकृत्य आख्यायिका मवर्तास्यति बरह्मविद्योयामास्तिकयं जनयितु `
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( २)
BAY सोधनचतुष्टयसंपत्थनतर || झश्वलायना
ऋग्वेदाचायो भगवन्ले पूजावन्तं परमेठिनं
attend परिसमेत्यशु/स्त्रीयेण
विषिनालमीपमांगल्य उवाचउक्तवान् अधीहि-
मदनुग्रहार्थ स्सरभगवन् ú gaasiga वेराग्येश्वययश्ः श्रीमान् aR seu देशकाल्षवस्तुपरिच्छेदशून्यस्य विद्याबुद्धिस्त- त्साझात्कारणं तांवरिष्टा अतिशुयेनश्रेष्ठां सदा- नितल्यंसद्भिदेहादिष्वात्मबुद्धि शूल्येः सेव्यमानां हृदयेधोयमाणां नियूढांसवर्भूतेष्वात्मनो विव्य मानत्वेन विद्यमानासप्यविद्ययोनितरां daa: ययाब्रह्मविद्यया अचिरात् अदीर्घेणकालेनसर्वपापं निखिलदुःखक्रारणमज्ञानं ससंस्कारं व्यपोत्ह्य विविधं परित्यञ्यविनाश्येत्यर्थः || निखिलजग- त्कारणात् हिरणयगर्भात्परं उत्कृष्ट अज्ञानाक्च
_ “यविषयत्बाथ्याँ पुरुषंपरिपृर्णम उपेतिप्राप्नोति । बिद्वान्अदमेवसोस्सीतिसाचादकारवान् ॥१॥
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(a) Pj कैवल्य ब्रह्मरूप जो अथ SAH प्रकाश करने चाली जो
A v, ७ `~ Kara नाम उपनिषद् cant व्याख्या करूँगा hae केवळ
कैवल्य स्वरूप आत्मा प्रसन्न दोवे ॥ १॥
` भगवती श्रुतिः माता के समान gaya शान के लिये किलो आश्वकायन ऋषि को निमित्त मान कर आख्यायिक्रा का sang कर रहो है ú जिलले ब्रह्म विद्या में आस्तिकता पैदा होती Š wa चार साधनों की प्राप्ति के पश्चात् आश्चालायन जो wig के आचार्य पूजावाले उत्तम स्थान में वेडे हुए जो ब्रह्मा उनके समीप शास्त्र विधि से जाकर बोले ॥ RC ऊपर agua करके घह्म विद्या को कहे हे भगवन् समग्न धर्म ज्ञान
Jay yrs यशश्री इन खब गुणों से बिशिष्ट आप देशकाल ag परिच्छेर से ga जो ब्रह्म उसकी विद्या को स्मरण करे sà ब्रह्म विद्या वरिष्ठ श्र दै देदादियों मे आत्म बुद्धि से रदित
विद्वानों से सेवन की जाती दै अर्थात् हृदय मू घारण at
जाती है खव जीवों में आत्मा के होने से सब जगह में विद्या
वर्तमान भी है तौ भी अविद्या से निरन्तर cat हुई दै जिस ag विद्या से अचिरात् बहुत जरदी सब पापों को और उसके
कारण अज्ञान तथा संस्कार से परित्याग करके सब जगत् के
कारण अव्याकृत प्रकृति से परे परिपूर्ण पुरुष को घंद भात
होता दै जो विद्वान बद ब्रह्म में हूँ इस प्रकार का साक्षात्कार €
बाळा है Ula’ Ul
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wa स होवाच पितामहश्च aga ध्यानयोगादवेहि । न कर्मणा न प्रजयाधनेन | y त्यागेनेके अछतत्वमांनशुः ७२॥ ¦
एवं एष्टस्तस्मे स्वशिष्यांय बह्मविद्याथिने | age सर्वज्ञः। इ शिल उवाचोक्तवान् | | पितामहश्च जगत् पितृयां दादीनां पित्ता | पितामहः कमलासनः चकारोप्यथः स पितामहे | syaa न adat कृतवानित्यथेः ब्ह्मविद्याया: साचाद्वकतुमशक्यत्वाचदथेस्य” AAT वाड. | मनसातीतत्बादतः सोपायान्तरंमाई Jarak | अर्षानयागात् | अद्धाआस्तिक्यबुद्धिः | सक्ति- | fad तदेकतात्पर्यबुद्धि; vad विजातीय ; प्रययशून्य सजातयप्रत्ययप्रवाहः एतेषां योगः |
` सम्बन्ध: तष्कारणसितियांवत् तस्मांदवेहि- जानीहि इंदानी यथाअद्धाअक्तिरष्यानयागो ब्रह्मविद्यायांकारणं तद्रसन्यासे5पीस्याह न
_कर्मणा श्रतेनस्सार्तेन वा न प्रजया 'पुत्रोदिना : हक Cs
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(x) ; aN ` पु €. 5 धनेनदेवेन मानुषेणघाविद्तेन नेतिपूवमनु$ agaa वच्यसाणानुषंगः कर्म प्रजाधन पदेष्वनुगन्त्यः त्यागेन नाखलभोतस्मातंकम परित्यागेन परसहंसाथमरूपेण पकेमहात्मांनः संप्रदायविदः ú अस्रतत्वसविद्यांदिमरणसँ- WAT आनशुः प्राप्ताः | २॥ ऐसा पूछुने. पर ब्रह्मविद्या के अर्थी तिस आश्वळायन प्रसिद्ध अपने शिष्य से वदद सर्घज्ञ गुरु जगत के रचने वाले दक्ष आदिको के पिता पितामह. ब्रह्मा ने कहा, कहने मै उपेक्षा नहीं की ब्रह्मविद्या amara कहने को शक्य नहीं है ॥ उसका अर्थ ब्रह्म भो बाणी और मन से अतीत है. अर्थात् वाणी और जमन का विषय नहीं है ॥ इस कारण भिन्न उपाय बताते š श्रद्धा भक्ति तथा ध्यान के योग से mat मास हेप्ता है आस्तिक्य बुद्धिको अद्धा कहते हैं भज्ञन का नाम भक्ति है उस ब्रह्म में एक तात्पयंता वुद्धि ध्यान है विजातीय शान से रदित खजा- तीय ध्यानको थारा ध्यान Š यद फळित हुआ उनशा योग अपने
में सम्बन्ध करकेइन्दी साधनों से हे शिष्य तुम ब्रह्म को aIL
इस समय जिस प्रकार श्रद्धा भक्ति तथा ध्यान योग ब्रह्म
विद्या में कारण है तैसेदी सन्यास भी है यह कह रदे हें । .
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श्रौतस्मोतं कम से पुचादि प्रजा से देव प्राप्त और मनुष्य प्राप्त शन से अस्त रूप मोक्ष को नहीं प्राप्त करते है ॥ केवळ श्रौतस्मार्त कमे का परित्याग जो पारमहंस्याश्रम रूप है उससे dansa | अविद्या आदि मरण भाव से राहित्य को ag करते हैं | इस बात को संप्रदाय जानने वाले कोई पक मझत्मा Rea है ॥ २॥
एवं gd संन्यासे--
परेणनाक निहितंयुहायां fase 9g. तयोाविशन्ति वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था सन्या- angan शुद्धसत्वातेघह्मलाकेषु परान्त- काले पराखतात्परिमुच्यन्तिसर्व || ३ II
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RU परस्माँत् नाकं क॑ सुखे तद्वि रोधिदुःखमक नाकं विद्यते यस्मिन्सनाकस्त ' स्वगस्यापरीत्यंथः । अथवा परेण परं नाक
' मानन्दांत्मानं निहितं afer स्वयमेवस्थितम्
"गुहायां बुद्धोविश्ञाजते विशेषेण स्वयंप्रकाशत्वेन प्रदीप्यते यत्मसिद्धं विश्वव्यापिस्वरूपस् यतयः
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कुतसन्यासाः प्र यत्नवन्तो ब्रह्म .साक्षात्कारस-
स्पन्ना विशन्ति विशन्ति इदं वयस्म इति ageng तदेवभवन्तोत्यथः यतोनांविशेष- णास्याह || वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः वेदा- न्ताप्रसिद्धास्तेम्यो जातंविज्ञानं विशिष्टं अहं ब्रह्मस्मीतिविज्ञानं तश्मिन्नेवसुनिश्चिताथः प्रया- जनं येषांते अथवा सुनिश्चितेऽयमित्थमेवेति सम्यगवबारितो ब्रह्मलचणोर्थः प्रसिद्खोयेस्ते
वेदान्त विज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगांत् |
सम्यक वान्तविष्ठादिवत् लोकद्वयभोागस्य
` न्यासस्त्यागः संन्यासस्तस्यपागोह ,संन्यांस्य-
स्मीतिवोधस्तस्माद्यतयः | व्याख्यातम् 4 पुनरादानं विशेषणत्वख्यापनाथ शुद्धसत्वा शुद्ध
गगाडिकषायरहितम् सत्वसन्तः करणंयेषां ते.
शुद्धसस्वाः एवं मूर्ताअपिकुतश्चिख् तिबन्धाट-
स्मिनशरीरे अनुत्पन्नसाचास्काराश्चेत् तदा. _ उक्ताः , यतयः ब्रह्मलेकेषुब्रह्मण कायस्थेक
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a Ta (=) | एवलेके।उनेकसूमिकाप्रौत्तांदवद्घः उपर्यादि विभागेनावस्थिता बहुबचनेनामिधोयन्ते तेषु ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परस्यत्रह्मणः SAFI ñas दितीयपराद्धावसान परान्त काल- स्तस्मिनपरास्तात् उत्कृष्टादसरणधमिणो व्या-
कृतात्परिसुच्यन्ति परिमुच्यन्ते स्वतेमुक्ता |
भवन्ति सर्वेनिखिलाः ॥ ३ u
इस प्रकार सन्यास करने पर वह सुख और उसका विरोधी दुःख पक नहीं है जिसमें ऐसे नाक के ऊपर अथवा सुख स्वरूप आनन्दात्मा अझ हृदय रूप Tet में निहित स्थापित
विश्वव्यापी रूप ब्रह्म को नियमन शीळ प्रयल वाले जिन्होंने ब्रह्म साक्षात्कार किया Š प्रवेश करते हैं। यह ब्रह्म हम Š ऐसा साक्षात्कार करने से ब्रह्म ही होते Š ॥
मंच में यतयः इस पद के विशेषणों को कहते हैं वेदान्त से उत्पन्न जा विज्ञान अर्थात् में ब्रह्म हैँ इस प्रकार विशिष्ट ¬ ज्ञान उस विज्ञान में हो निश्चय किया गया है अर्थे प्रयोजन
होता हुआ स्वयं प्रकाश रूप प्रकाशित होता है उख wes
। जिनका ऐसे यति हैं ॥ अथवा यह ऐसा हो है इस प्रकार | Na Na हि
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_ चेदान्त विज्ञान खुनिश्चिताथ एस पद से विशेषण किये गये हैं ।
संन्यास योगात् ,। . वान्त और विष्टा के समान दोनी लोक के भोग का न्यास त्याग संन्यांस है । उसका योग में सन्यासी हुँ इस प्रकार का जो बोध बद्दी योग दै । [तिस योग हेतु से शुद्ध सत्वा ॥ शुद्ध रागादिकषाय रहित सत्व अन्त: करण Š जिनके किसी प्रतिबन्ध से इस शरीर में ब्रह्म सात्तात्कार नहीं उत्पन्न
« हुआ तो उक्त यति सब ब्रह्मे हिरण्यगभ के लोक में जिस'लोक
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में अनेक प्रासाद के सदश AA ऊपर भाग में से उत्तमोत्तम स्थान adala Tad है वे सब yaa हिरण्य गर्भ के विनाश काल में द्वितीय परादुध के अन्त "मे *अपरासृत, sae, aa wa से रहित सवके सब मुक्त हो जाते Š ॥३॥
इदानी' ब्रह्मज्ञाना वाप्त्यथसुपासना कलु
। रुपवैशनार्थ. देश विशेषादिक माह. | «
विविक्त देशे 'च सुखासनस्थः शुचिः
ada शिरः शरीरः । Tanah सक- । लेंद्रियाणि निरुष्य . भक्त्या sage, प्रणम्य ॥ | इत्पुणडरीकविरजं विशुद्ध विचिन्त्य मध्य fgg / RNE |+ ४ .॥
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मलं पञचढछिद्रादि विशेषणं ॥ विरजं विरजस्कं आपगत रांगद्देशादिकं विचिन्त्य विशेषेणध्यात्वा मध्ये हृत्पुणडरीकस्यान्तः विशद निमलं शुद्ध- स्फटिकसंकाशमित्यर्थः विशोकं Arane विगतशोक जदुःखंविशेक || आनन्दपण हृदय Rama नंचेत्यथः ॥ ४ ॥
इस समय ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति [के लिये उपासना करने के देश विदेश को कद्दते हैं। .
पकान्त देश में सुखासन पर बैठा हुआ ॥ यहाँ एकान्त देश से अब्याकुळ काळ का भी ग्रहण करना चाहिये उद्धेगन करने चाला जो सुखासन उस पर स्थित हुआ जो पुरुष शुचिः बाहर भीतर पवित्र सरळ सीधा शरीर समान aga SK शिर है जिसका ऐता ब्रह्मचारी ग्रदस्थ वानप्रस्थ कुटीचक agen
'इंस इन Baal से परमहंस GaY रूप MAA अत्याश्रम सबं
श्रेष्ठ आश्रम दै उसमें स्थित रहने वाळा अत्याश्रम कहा जाता
है! मन के ata सम्पूर्ण कम्नेन्द्रिय और शानेन्द्रिय को अपने - अपने विषयों म॑ जो प्रचार उससे रोक कर भक्ति फे साथ देव के समान व देव से अधिक तत्वमसि इस महा वाक्य के अर्थ $
__ का बोध,कराने वाले अपने ge को जान कर और प्रणाम करके
सुखासन was तिसके बाद ú पुण्डरीकं aia कमल जो '
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पाँच feat ले युक्त Š ॥ विरजं anjar रदिंतःहै Fags ag हो गया-है समस्त दु:ख आदि दोष जिसमें ऐसे हृदय के मध्य में विषद निर्मळ aga स्फटिक के समान विशोक दुःख रहित आनन्द से भए हुआ gaa जिखका कुछ विहखिद मुख
इंस प्रकार सगुण रूप ब्रह्म का LAT HE ॥ ४॥
अचिन्त्य मब्यक्तम नन्तरूपं शिवं प्रशान्त |
मस्तं ब्रह्मयोनि || ५॥ ` `
वस्तुतस्तु. 'अचिन्स्यम् वाङमनसातीत Ag: | अव्यक्तम्. शुब्दाघ शेष शून्य त्वाद स्पष्टम् व्यक्तम्. असत्वं परिच्छेदंच anata अनन्तरूपं नविद्यतेऽन्तङ्यत्ता रूपाणां यस्य सोऽनन्तरूपं देशकालवस्तु' परिच्छेद शून्यंस् Sara रूपं शिवं मंगलरूपं प्रशान्तं अविद्या. दाषरहितम् अमृत . कालत्रया संस्पष्ट Iga
“बढा. निरतिशयानन्द . रूपत्वेन ब्रह्म Tea
dia प्यधिकम् योनि जगञ्जन्मांदिकारः
णम ५ Q ब्रह्म परमात्मा येद् का योनि कारण Š अचिन्त्यं पाणी और
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š ( १३: )` NA n मनका विषय म होने से शांन के प्रवाह का अ्रविषः Š ॥. अव्यक्तम् शब्दादि संपूर्ण विषय विशेष से 'शून्य होने के कारण स्पष्ट नही' हाता परन्तु मान रहित है इयक्त नहीं दै जिसके रूपों का देश काळ वस्तु परिच्छेद से रदित Š ॥ शिवं मंगळ रुप है l. प्रशान्त अविद्या दोष से रहिंत Š अनन्त तीनों काळ मे जिसको wag नहीं दै । ब्रह्म बड़ा सबसे अधिक हे योनि जगत के जन्म पालन.और नाश का कारण Š ॥ X ॥
तथा दिमध्यान्त विहीन मेकं विभुंचिदा- नन्द सरूपसदुमुत ॥ ६ U , तथा दीति--तथां यथेद्विशेषण जातं तद्वत्खरूपमपि आदि मध्यान्त विहोनं ger. त्ति परिच्छेद विनाश वजि तं aag: ॥ एक द्वितीय वस्तु रहितं विभुसमथ ध्यापिनँवा चिदानन्द स्वय' प्रकाशमानं निरतिशयानन्द अरूपं Agaa व्यतिरिक्त रूप रहित ॥ ततो5दुमुत माश्चय ai N ६॥ ` ` _ तसेही आदिमध्य और अन्त से बिंदीन दै 1 safe परिच्छेद विनाश से वर्जित है ॥ एक अद्वितीम है वस्तु मात्र” , से रहित Š Ag समर्थे और च्यापी है fags स्वयं
CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri टार ई
7 ( १४ ) पफ निरतिशयानन्द रूप है ॥ अरू पचिदावन्द के सिघाय दूर्सरा रूप नदौँ ë तिस कारण से aga आश्चार्य रूप है ऐसे परमात्मा को ध्यान करके मुनि छोग अज्ञान से परे ब्रह्म को प्राप्त होते Š ॥ एख प्रकार खातचे' मन्त्र के साथ सम्बन्ध जानना ॥ ६॥
उमासहाय परमेश्वरं sy त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तं घ्यात्वा सुनिगच्छति भूत- योनि समस्त साक्षि तमसः परस्तात् ॥ ७ ॥
समस्त साचि, सवंसाचिणम् इकारान्तः शाचि शब्दश्डांदसः उमा सहायं उमा ब्रह्म - विद्या भवोनी दा सहांयः अद्ध नारीश्वरत्वेन amg स्थितालुरूप युवतिरूपत्वेन वा यस्य स उमासहायः तं परमेश्वरं उत्कृष्ट ब्रह्मादि निय- न्तरं प्रभु समर्थ astaq त्रीणि सोम gal-
aah लोचनानि यस्य स त्रिलोचनस्तं
नीलकण्ठं छुष्णकण्ठं प्रशान्तं प्रसन्न वदने-
aT ध्यात्वेति ú च्यात्वां प्रत्यय प्रवाहेण
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साच्षात्कृत्य ॥ सुनिभननशीलः प्राप्नोति गच्छति
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( १५ ) SEA
भूत येनिमाकाशादि महाभूत कारणं Ak fe कारणत्वोपाधिकमित्या शुंक्यऽऽह समस्त साचि' सवे सांचिण' सव बुद्धि प्रचार Cek agar न केवलस्यत्य आह तमसः आवरण (qq शक्ति रूपाया अविद्यायाः ` परस्तात् परतोऽविद्यो सम्वन्ध शून्य इत्यर्थः॥७।|
समस्त साक्षि यद्दां पर anf शब्द हस्व इकारान्त Giga जानना ॥ वह ईश्वर सबका खाची हे ॥ उमा ब्रह्म विद्या सहा- यक कामादि दोर से रच्तक है जिसके अधनारी शरीर होने के कारण अनुपम युवती सवानी वाम अ'ग में है जिसके परमेश्वर उत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवों का नियम न करने वाला प्रभु समथ 8 Gata सोम सूयं अग्नि तीन नेत्र हैं. जिसके॥ नीलकण्ठ. श्यामकण्ठ Š जिसका प्रशान्तं प्रसन्न सुब और इन्द्रिय हैं जिसकी ॥ ऐसे ब्रह्म को साक्षात् करके विचारशील मुनि आका- - शादि भूतों का कारण त्वोपाधिक ad है समस्त साक्षि सम्पूर्ण aka की गति का इष्टा है | केवळ साक्षित्व द्दी इही दै fag आवरण और विक्षेप शक्ति बाली जो अविद्या उससे परे अर्थात् अविद्या सम्बन्ध से शुन्य है॥ ७॥
` 5 ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः STE परमः
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"s E स्वराज स एव विष्णुः स प्रोणः स कालाग्निः
` से चन्द्रमा ॥ ८ ॥
सेन्द्रः स इन्द्रः छांदलः सेषिः॥ उमा सहायो vaara: प्राप्नोत्यविद्यायां डिद्या- दशायां aaa स उक्तः बह्मा प्रथम शुंरीरी कार्य कारण सूतः स उक्तः शिवः उमा सहायः सेन्द्रः स उक्तः इन्द्रः त्रिलाकीपतिः स Sm अचरः विनाश रहितः परम उत्कृष्ट: स्वराट अन्यानपेच सेन स्त्रयमेव usa इति Tu, स एवोक्त एव विष्णुः व्यापन sta: शंख चक्र गदाधरः स उक्तः घ्राणः प्राणादि पञ्च बृत्ति रूपः स S=: कालाग्निः कालरूप वैश्वानरः स उक्त AAA शशाङ्क: ॥ ८ l
` उपासन्ः फे द्वारा अविद्या से रहित विद्या š प्राप्त होने पर
SA ब्रह्म प्राप्ति के योग्य, Š ॥ यही वात इस मन्त्र में कहा
जाता Š ॥ प्रथम शरीरी कायं कारण रूप ब्रह्म जो कहे गये हैं ॥
` बही शिव रूप जो उसा के पति हैं ॥ बही इन्द्राणी के पति इन्द्र Š । बदी ज्रिलोकी पति कहे जाते Š वही स्वराट् अन्यकी
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( १७ ) Nees
अपेच्ता न करके अपने. स्वरूप से जो शोभित होते E विष्णु 'च्यापन शीळ हैं शंख चक्र गदा पद्य को घारण किये हुए हैं भाण अयान सनान उदान व्यान ये पांच वृत्ति वाळा प्राण भी उसी का रूप दै कालाग्वि काल रूपी, अरित भी बदी हैं चन्द्रमा मी ag परमात्मा š [ इस प्रकार सवं रूप परमात्मा है H =l ` सएव सर्व यहुभूतं यच्वभोव्य'. सनातन ज्ञात्वा iga मत्येतिनान्य: पन्था विमुक्तये ॥६॥ सपूवेति ॥ सएव उक्तएव सर्व निखिल यत्प्रसिद्धं सूतमतोतं qa यद्पि भावय भावि चकाराद्वत मानमपि सनोतनं चिरन्तनं ज्ञात्वाऽहं FARAH साक्षात्कृत्यत सुक्त मानन्दारमानं tamat ससंध्कारामत्येति अतोत्य गच्डदि II “बन्य उक्तादुवह्मज्ञानात् व्यतिरिक्तः पन्थामागः दिसुक्तपे विसु क्यर्थं नास्तीतिशेषः ॥ यद्वो त्रणणां विश्वतेजल प्राज्ञानां विराडिढरण्य . गभे श्वराणां वास्वय' प्रकाशुखेन Arad प्रकाश स्वरूपं त्रिलोचनं नोलकणठं नोलं तमोऽज्ञानं „ , कण्ठे ऋणठवंञ्चिदेक . देशेऽविक व्यातिम त्वेन
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हु MEA ( ९८ )
चेतन्येस्यवतते यस्य स नीलकण्ठस्तमिति व्याख्यातं तथा विशदसविद्यारहितं ॥ RJE दुःख संस्कार रहितं ॥ उमासहायं ब्रह्म विद्या सहाय' ॥ प्रशान्तं पुनरुत्थान deste वर्नित मिति निगु'ण परत्वेन समघ वाक्यम व गन्त- व्यः . निशु'णस्याप्युपलव्धत्वेन हृदय प्रदेश मध्यस्थत्वसविरुद्ध तथा च ध्याता मनन निद ध्यासन कृत्वेत्यतदुपपन्नमेव ॥ ६ n
जो कुछ जगत में प्रसिदुध Š ag सब बरह्म है भूत भविष्यत्.
वतमान तीनों काळ ब्रह्म ही का रूप Š उरू सनातन ब्रह्मको में ब्रह्म हूँ इस प्रकार जान कर संस्कार के सहित अविद्या रूप wg को तर कर पार चला जाता है उक्त ब्रह्म विज्ञान से भिन्न कोई मांग दुसर! विमुक्ति के लिये नहीं हे यहाँ रूप्तम खे नवम मंत्र तक कितने पदों का व्याख्यान पुनः कर रहे Š ॥ विश्वतैज- ama तथा Aug हिरण्य गर्भ इश्वर इनको स्वयं प्रकाश रुप होने ते जिलोचन यह तीनों स्वयं प्रकाश स्वरूप
है यह अर्थ हुआ Ne पद् से अज्ञान का अदण 2 वह
ज्ञान के पक देश में कण्ठ में जैसा वेसा व्यासो करके है जिसके विषदं अविद्या रहित Š विशोकं दुःख संस्कार से रहित हे _ उमासहायं aa विद्या सहायक है । जिसके प्रशान्त अभ्युद्य
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के संस्कार से रहित Š इस प्रकार निणु'ण व्रहापरक इद पदों की व्याख्या करते हैं ॥ ध्यात्वा उसको मनन निद घ्यासैन करके:
इस प्रकार ध्यात्वा ज्ञात्वा पद को व्याख्या निणु'ण. बरहा मे' बन _
सकती Š ॥ au | ; "सर्व भूतस्थ मात्मानं सव भूतानि ARA निसंपरयन्त्रह्म परसं याति नान्येन हेतुना ॥१०॥. aa सूतस्थ fated yer वर IRAY तिष्टतीति सवं सूतस्थस्तमात्मानं Haa
gara सरी भृतानि च निखिलानि स्थावर
जङ्गमानि ast भूतानि चकार आधा राधेय `
साव व्य GHA: ॥ आत्मनि आनन्दात्मन्यहे Tang सपश्यन्सस्यक संशय _विपर्यय तरेणावलोकयन् ब्रह्म ET काल वस्तु
` परिच्छेद शून्यं परम उत्कृष्ट मनुपचरिसं मित्यर्थ याति प्राप्नोति नयातीति देहली _दीप्रन्यायेन .
संबध्यते नयाति न प्राप्नोति अन्येन IPT व्यतिरिक्तेन हेतुना कारणेन || १० Il canal गच्छतीत्यस्य व्याख्यार्न ज्ञात्वात
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3 मित्योह्रि ॥ नान्यः पन्था बिसुक्तये इत्यस्य
व्याख्यानंमिद्सवं सूतस्थ मित्यादि qamasi
ज्ञानो त्पद्यते तदा तदुपादाने उपाय साह
: सर्वे भूतस्य ॥ सम्पूर्णं स्थावर जङ्गम में जो विद्यमान दै
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आत्मानं हमारे ज्ञान और व्यवहार के योग्य ॥ खच भूतानि |
सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम को जिसने रचा एक बार सबको रचने से आधारा Sq का क्रम नहीं Š यह अथ प्रतीत होता है ॥ झहं प्रत्यय योग्य आनन्दात्मा में संशय विपर्यय के वित्ा॥ -संपश्यन् ॥ ज्ञान को प्राप्त करता हुआ ब्रह्मा बृहत् देश काळ
« वस्तु से जो परिच्छेद उससे शुन्य परम् उत्कृष्ट ॥ अन्ुपचरित
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2 | अर्थात् मुख्य उत्कृष्ट है ऐेसा जो aa उसको प्राप्त होता है और कोडे हेतु से प्राप्त नदीं होता ॥ १०॥
` ध्यात्वा गच्छुति इसका व्याख्या ज्ञात्वातं इत्यादि जानना -नान्यः पन्था विपुक्त्ये इसका व्याख्या < भूतस्थं इत्यादि जानना ॥ जव इस प्रकार शान उत्पन्न न हो तब उसके पैदा Ka में उपाय कहते है ॥ '
Samat कत्वां - sasi चोत्तरा- fq ॥ ज्ञान निर्मथनाभ्यांसात्पाशं दहति पण्डितः ॥ १९ || ` झात्मानमन्तः करणां अरणि वन्हिजनकं
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( -२१ ) ste मन्त्र संस्कृतं काष्ठ काउघेविधायाउपधर्ररणि रवेन चिन्तये त्यर्थः प्रणवं ॐ^कार मुत्तरारणि उत्तरारणिमपि चकार कत्वेतेतदनु TANA: ॥ ्ञाननिरमथनाभ्यासात् ज्ञानस्य सर्वात्मकोऽह Ted रूपस्य faqaq य क्ति शिविज्ञोडनं तस्याभ्यास आबृत्तिरुपो ज्ञान निर्मधनाभ्योस स्तस्मा दुत्पन्नेनाह ब्रह्मास्मोति aaant- ग्निना पाशं आत्मनो वन्धनरूपमज्ञानं रज्जु रचित महं समादि ग्रथि दहतिभस्मीकरोति qea: wee: बरह्मांस्मीति जुद्धिस्तामितः- प्रातः पणिडतः ú ११ ॥ आत्मानं=-अन्तः -
कारण को अग्नि पैदा “करने, वाको मन्त्र संस्कृत अरणि काष्ठ बना कर अर्थात नीचे की अरणि. चिन्तन कर MAL
ऊपर की अरणि चिन्तन कर ॥ सर्वे मय में हूँ इस प्रकार ज्ञान `
रूप मथानो के अभ्यास से विद्वान् लोग ॥ में, ब्रह्म हूँ इस प्रकार साक्षात्कार रूप अग्नि से: अपने पाशको {अन्ञानरूपी रस्सी a बेनांया GALA मेरा इस भ्रन्थिको ददति भस्म करतेहे ॥ WISE.
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— 7 ( २२ ) duta इस बुद्धि का नाम है उसको जो प्राप्त हो që पण्डित È ॥ ११॥
नन्वस्यासँ गोदासो aa दितोयस्य gua: संसारः पाशरूप इत्यतआंह ,
सएव मायांपरि मोहितात्मा शरीर ar aia करोति सवं स्त्रियान्नपानादि विचित्र Dat: सएव जाग्रत्परितृ्ति मेति || १९ ú
सएवोक्तोऽसंगोदारीन -एवनत्वन्यः AN-
या परिमादितात्मा मायांअविद्या्दरण विक्षेप | करी शक्ति; तया परिमोहितोऽऽ त्मास्वय प्रकाश
'आनन्ढात्मा स्वस्वरूपायः समांया परिमोहि-
तात्मा श॒रीरं स्थूलादि भेद भिन्नं मनुष्यादि
कलेवर मास्थायोहं मनुष्य इल्याद्यसितानेना
समन्तादस्वाकृत्य करोति सर्व निखिल व्यापार - 'जातं get Rama पानादि विचित्र भोगः ` स्त्रियोमने।ऽतुकूला युवतयेःऽन्नपाने -सनोऽनुकूले आदि शब्देन बसनाच्छादनादीनि
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सनोष्नुकूनानितेः स्त्रियान्नपाना दिश्लिविचित्र
गेः स्त्रियेतिच्छांदसः सएव माया परिमूढ एवनत्वन्यः जांएज्जांगरण सिन्द्रिय वाध्य वि षयोपलब्धि रूपं कुवेन्पस्तिति' सवतो विषय सुखजा gada गच्छति सुख दुखं च प्राप्नो Tam: ॥ १२ H
असग उदासी न अद्वितीय आत्मा को WTSI संलार किस तरह. से होगा इस आएको को चित्त में रख कर कहते हैं |
सण्वेति ॥ चही अलंग उदासीन aga आत्मा दुसरा नहीं माया परि मोददितात्मा ॥ माया अविद्या आवरण तथा BA करने बाली शक्ति faa परि मोदित है. आत्मा स्वयं अकाश MAGA स्वरूप जिसके वह स्थूल WIA कारण इन तीन AL से भिन्त apa शरीर का आधय लेकर मै मनुष्य हूँ. इस अभिमान को aaa: अपने मै स्वीकार कर सम्पूणं चयापारों को करता है खरी मन:के अचुकृक युवति अन्न पानादि से आसन आच्छादन जो AAR अनुकूछ हैं saa वही माया
पारमूढ़ जीव Et दूसरा नद्दी' जागृत feat से वाध्य विषय '
का ज्ञान करना जो जागरण उसको भाप्त Slat हुआ पेरि afer
सब जगछ में विषय ga से उत्पन्न तसि दै mata सुख दुःख
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š Ly ( २४: ) को प्राफैहोता है संसारिक तृप्ति को दुःख से मिश्रित होने से दुःख रूप भी कहते हैं ॥ १२॥ | इदानो' स्वप्तसुषुस्यो विचेपतद्भावक- थनेन संसार मोंचयो रर्थाष्टान्तमाह | ... स्थप्नेसजीवः सुखदुःखभोक्ता स्वमाय- ` थाकल्पत जीवलोके ॥ सुषुत्ति काले सकले विलीनेतमोऽभिभूतः सुखरूपमति ॥१३॥
बप्नेइन्द्रिय .्रासोपरमरूपायां स्वप्ना- वस्थायां. सजीवः. प्राणानां ` धारयिता विविध- विषय वासनावासितः gag aAa g सुख्यहं दुःखी येवरूप प्रत्ययवान् Sasana Il MAGA, दृष्ठान्तेन बास्तवस्वं वारयति || स्वमायया . स्वस्यतत्ढुदेहामिमानिनो माया झज्ञानं विपरीतज्ञानं च. तथाः कल्पित॑विश्व- लाके करिपतेदासंनारूपे विश्वस्मिन् रथरथयोग mules निखिक्ष भुवने लेके बने जने च कल्पित विश्वलोके स्वप्ने. यथा aam-
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(२५) e त्यर्थः ॥ सुषुप्तिकाले आनन्द Naa? सकले निलिले RA विशेष विज्ञाने स्वका- रणलयंगते एतावान् सुषुप्तो nga समोन्यायः || कोविशेषः ॥ इयांस्तु विशेष; । तमेऽमिमूत ` असानाइतः सुखरूपं स्वप्रकाशमान मानन्दात्म स्वरूपमेति गच्छति ॥ १३ y
अपनो माया अपने अज्ञान से रचा हुआ जीव लोक में जीव ga दुःख का भोक्ता है । इस प्रकार पदों कां परस्पर
सम्बन्ध करना चाहिये ॥ सम्पूर्ण जगत के लोन होने पर तमोऽ `
मिभूत: अज्ञान से nga होकर सुख पूवक सोता दै संक्षेप से इस मन्त्र की व्याख्या कर दी गई इदानी यहा से आरम्भ कर °
विशेष रूप से व्याख्या करते हैं ॥ इस समय स्वप्न और gua :
अवस्था में विक्षेप तथा विक्षेप का अभाव इन दोनों को कहने
से ॥ अर्थात् संसार और मोक्ष में cara कहते हें॥ वह.
जायत अवस्था चाळा जीव इन्द्रिय समूह के व्यापार से निवृत्ति रूप स्वप्नावस्था से जैसे भोक्ता है sha घुद्धीन्द्रिय का धारण करने वाला अनेक चाखनाओं ले वासित प्रसिद्ध सुख दुःख का मोचा है ॥ मैं सुखी ह्वा मैं दुःखी हो इस प्रकार का अनुभव शान जीव की खुख दु:ख का भोका वताना है संसार दशा में
ज्ञे दन्त, सतत. किया, समा Dia ci Piate मेक ०
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को बारण,करता Š इसको स्वमाय या कहिपत जीव खोके इस | पद से उपादान करते Š उन दो देहों के झसिमानी जीव कीं | झपनी जो मायां अज्ञान ब विपरीत ज्ञान उससे कटिपत वासना | q सम्पूर्ण रथ रथ योग पथ आदिक समस्त लोक ATA सब | जन फे हाने पर सुख दुःख का AMA चाळा मिस प्रकार स्वप्न में है वैसे दी जागरण में भी हे ú Gola काल में आनन्द भोग के अवसर पर सब सलार और विशेष विज्ञान अपने कारण मे विलीन देने पर अज्ञान से आवृत्त होकर स्वयं प्रकाश आनन्द | रूप अपने स्वरूप को प्राप्त होता हे ॥ अपने कारण a` सब संसार का ल्य होना इतना अ'श GTR और मोक्ष में समान | Ë मोच में ज्ञान से और qed ama से आदत | Qar दै इतना विशेष है ú १३॥ : | पुनश्च जन्मान्तर कस योगारसएउजीवः |
स्वपिति aga: पुरत्रये क्रीडति यश्च जीवस्त | तस्तु जातं सकलं विचित्रं आधार सानन्द अखंड बघं यस्मि ss याति पुरनय च ॥ १४ n" पुनश्चेति ॥ पुनश्त्राऽऽनंद्/रमस्तररूपे प्राप्य TAMA जन्मान्तर कसये'गारप्राग्भावीय | कर्मानु आरात् स पवाऽऽनन्दात्मस्वरूपं घात सुषि गतो न त्वन्याजीवः घाणधारकः |
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(२७)
श्वपिति aama गच्डति.सुषुत्यकत्यानात् saat Iga: प्रबोधे जागरण प्राप्तो भवती- तिशेषः | इदानी जीव बह्माणेरेक्यमाह पुए- ` alga सूचमाऽज्ञानाख्ये sr क्रोड़ति विहरति यश्व जीवः ॥ चकारएवकारार्थ: TE: AAT MUIE: ततस्तु तस्मा देव जोवामिन्नो नत्वन्यः U नस्माउ ज्ञात मुत्प- न्न सकलं निखिलं विविधं विचित्र कर्मना रूप विश्वं आधार रउजुरि ad धारावी वद सूत्रितत्वादेः सकलस्य विश्वत्य आधारमूतं mat निरतिशयानन्द स्वरूपं aaar Nq- सानन्द्रूपसेति ॥ ag प्रकाशे त्वमावं यस्मिन्नख ड ndak Rajah गच्छति || युरजय च siena च शब्दादन्यदवि uv उ, जब जीव जाग कर स्वप्न से उठता दै तो विश्व तेजस. MT इनसे मानी हुई तीन अवस्था रूप तीन पुरो में जीव से n सम्पूर्ण AN प्रकार का संलार होता, है । इन तीन पुरो में जीय कीड़ा करता है, HAMS, AL, जानका Har music है, | : | —g
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ण (२८) faut ये तीनों पुर बिलीन होते है जन्मान्तरः कम्मे के सम्बन्ध ले वदद! जीव जो जागत में ga दुःख का भोक्ता है वद Gals मै आनन्द स्वरूप को प्राप्त होता है दूलरा नही' खुषुसि अवस्था से कभी स्वप्नावस्था में कभी जागरण अवस्था में आता दै । यश्च यहां चकार एवक्ते अर्थ में दै जो जीव प्रसिद्ध परमात्मा रूप ही है जीव से अभिन्न परमात्मा से ही संखार उत्पन्न हुआ दूसरे से नद्दी' जिस प्रकार रस्सी खपे पानी की धारा बली बद् का सूजितादि ara संसार का आधार दै ।
उसी प्रकार ब्रह्म सबका आधार Š | निरतिशयानन्द स्वरूप अखण्ड वेघ एक स्वयं प्रकाश स्वभाव ह ॥ जिसमे तीनों पुर ल्य को प्रात होते Š ॥ च शब्द से अस्य una खंसार भी ळय at ote होतां है ॥ १४॥ ea
एलस्मांञ्जायते प्राणोसनः सूर्वेद्रियाशि चं ॥ खवायुर्जाति राएश्च एथिवी दिश्वस्यधा- रिणा ॥ १५ | एतस्मात्पुशजत्नया Asares ष्टुर्जायते उत्पद्यते
प्राणः क्रिया शुक्तिः asa करणां
` ज्ञान शक्तिः ॥ सवे निद्रयाशि च सवं ज्ञानं `
कमे sana च शब्दादे ह दिऊ' मपिखं
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नरः sa शुणवतू वायुनंभस्वान् ज्योति; तेजो
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Wg: आपः नीराणि प्रथिवी qf विश्वस्य
fiaa स्थावर जंगमात्म कस्यप्राणि Tag धारिणी विश्वधारिणो ॥ १५ | ._ इस sQ अवस्था वाले ब्रह्म से प्राणां दिसव उत्पन्न aa < ॥ यह AÀ इस मन्त्र का संक्षिप्त है ॥ अब बिस्तार से आरम्भ करते हक ॥ एतस्मादिति ॥ इल gora का अधिष्ठान तथा बुद्धि का साक्षी a से प्राण क्रिया शक्ति वाळा वायु उत्पन्न दाता है ॥ मने शान शक्ति वाळा अन्तःकरण सम्पूर्ण कम द्विय ज्ञा `- द्व्य और च शब्द से देहादिक भी उत्पन्न ga हैं आकाश वायु | तेज जळे स्थावर ज गम तथा प्राणि ATER धोरणं करने वाली पृश्चिवी ये सब बस्तुये' उत्पन्न दाते है ॥ १५.॥ इं दानी' मद्दावोक्याँथ माहँ IT ब्रह्म स्वात्मा विश्वस्यांय तनं
` महत् सुद्धमात्द तरं नित्यं तत्वसेवः aa-
तत् ॥ १६ ॥ यत्प्रसिद्धं उत्कृष्टं पर ब्रह्म बृहद शः काल
= ge ig Dn को शन Sete Fr a adat णिस्थि MEA बस्तु परिच्छेदः शून्य सर्वातमा संवंभाणिस्थितः CC-0. Mumukshu Bhdwan Varanasi Collection. Digitiz y eGangotri
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चण (३०)
संवा ward विश्वस्ण सर्वस्य कार्य कारण जातस्या यतनं आधार थत महत्मोढं सर्वाधार- qaq GR दणु परिमाणात् सदेमतर मह- दप्यतिशये नाझुः नित्य विनाश शुन्य तदुक्त
परं ब्रह्म त्वमेव तद॒वर्ग तेवनत्वन्यत् ॥ ननु तन्मत्तोऽन्यदहं तस्मादन्यः मयि कर्तृत्वादि विशेषा पलस्भादित्यत आह Ú त्वसेवतत् el-
कर्ता भाक्ताऽविद्यया वस्तुतः परं agan
त्वन्यः | १६॥
- अब जीव बरह्म का अभेद् वाधन करते Š ॥ आप ब्रह्म ही हैं SAMIR और ब्रह्म का सेद् नहों है अथ इख समय महा वाक्य .
का अर्थ कहते हैं यत्पर ब्रह्म जा प्रसिद्ध पर उत्कष्ट Za देश काळ बस्तु परिच्छेर शत्य सब प्राणियों के हृदय में वर्तमान सर्च रूप सम्पूणं कार्य कारण समूद फा आधार मदत्योढ़ सब .का आधार दोनने से वलिए gaa खे सदम नित्य बिनाश ae
जो पर ब्रह्म वद आप दो हैं बद्द ब्रह्म झरत स्वरूप Š अन्य नही. ag शंका हाती है बरह्म में agak धर्म ad हैं और
' मेरे में कतंस्वादि ad हैं इलळिये सेद दै । समाधान करते हैं ॥ अविद्या से जीव कर्ता भेक्ता.द वास्तव में ब्रह्म रूप ही Š दूसरा
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(३१) An चया इदानीसेवज्ञाने फत्र माह || KAA सुघुप्त्याडि प्रपञ्च यत्प्रकाशते तदुब्रह्म।हसतिति. ज्ञात्वासञवन्येप्र सुच्यते || १७ ú ` जाग्तस्वप्नेति ॥ ana सुषुप्त्यादि श्रपञ्च H MARAT सुषुतथउक्तास्तदादयो विश्व बिरादादयोस्ते एव प्रपञ्यो जाग्रतस्वप्न. सुषुप्त्यादि ्रपऽचस्तं afte’ स्त्य प्रका- शृते । प्रकाशयति aga स्त्रयः प्रकाश ब्रह्म सत्य ज्ञानादि weal अह बरह्मावगांन्ता चिदा. नन्डांत्सां FAA प्रकारेण ज्ञात्वां साक्षात्क॒त्य asl वन्ते few वन्णे रहममाये रेवसकारणोः प्रसुच्यते Tat णसुक्तोभवतीति |: १७ ५ इस सभय ज्ञानक! फल कहते हे प्रपञ्च पद पद छन्दस AG- सक है ॥ अन्यथा प्रपऽचो ग्रन्थ चिस्तरः इस जगह? प्रपञ्च शब्द . पुदिळग देखा गया है afer vet भो पुल्लिंग ही उचित है परन्तु छान्दस BA से नपु'सक हे. गया॥ ब्रह्म और जीव क. अभेद जघन में इस समय फळ कहते Š ॥ जाग्रत स्वप्न सुषुसि ये तीन अवस्थाये ॥ विश्व तैजस'प्राज्ञ॥ विराड 'दिरराय गये
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fase (३२)
` = > | - इश्वर दद सप प्रपञ्च प्रसिद्ध जा प्रकाशित दो रहा है वह सय |
सत्य nae रूप ब्रह्म दी है और वहा में É इस प्रकार मैं मेरा इत्यादि कारण सहित बन्धनों से अत्यन्त छूट जाता है॥१७॥
इदानी सव प्र पञ्चाठ्नेल'च्षणय साह || त्रिषुषोससुवद्भोग्यं सोक्ता भोगश्च यढुमवेत् तेभ्यो विलचणः सांची चिन्मांत्राऽहंलदा- शिवः ॥ १८ ॥
त्रिषुधामस्विति Ga जागरण स्वप्न gygy धामसुर्थानेषु aagi भोग्य स्थूल
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प्रविविक्तानन्द स्वरूप ॥ भेःक्ता विश्व तेजल |
प्राज्ञाख्यः भोगश्च स्थूल प्रविविक्तानन्द ANA च शव्दा,दधि देवा दिवि आगोणि yaaa त्रिधाम भोग्यादि प्रपञच जातं भवेत्स्यात्स्पष्ट तेभ्यस्त्रिधामादिभ्यो aga: विपरीत लक्षणः दबचणझमाह साच्ची atag विश्वस्य दरष्टा चिन्मात्रश्चिदेकरसः अहे आहं प्रत्यय ° वथवहार योग्य; ॥ सदाशिवः केवल्यात्मानित्य कल्याण. रूपे. महेश्वरः ॥ १८. ॥ -
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(३३) Pe __ इख समय सच प्रपञ्चो से विलक्षण बात कहते ša जांग- “रण स्वप्न सुषुसि इन तीन अवस्थाओं में जो प्रसिद्ध स्थूल प्रवि- ` विक्त आनन्द स्वरूप भोग्य अर्थात् जागरण में स्थूल स्वप्न मे अविविक्त एकान्त पास में रहने वाले भी जिसको नही" देखते सुघुति,में आनन्द स्वरुप विश्व तैजल प्राज्ञ इस तरह से भोका का विभाग जानना स्थूळ प्रविविक्त तथा आनन्द स्वरूप का सो इस मकार तीन प्रकार का भोग भी Š च शब्द से अधि- दैव अध्यात्म भोग भी सेना यह भोक्ता भोग्य भोग खम द जो कुछ दै उन सबसे विलक्षण सदा शि रूप चिन्मात्र साक्षी स्वरूप में हुँ ॥ १८॥ : प्रपञ्च dag saka इदानी' जगज्जन्मादि कारण wale खस्याह ० सय्येव सकलं यातं मयि सर्व प्रतिष्ठित ç ° रि सि सर्व aa’ याति तदुवह्माद्रयमस्म्यहं १६ सय्येवेति ॥ मय्येव मत्तएव ब्रह्मां सिन्ना- न्नत्वन्यस्मात् सकलं fas सूत” भौतिक . ग्रपञ्च जात | जात Ika | मयि ब्रह्मा
भिन्ने सर्व निखिलं fied. प्रतिष्ठित. प्रकर्षेण «
स्थित प्राप्त ॥ मयि. सवं व्याख्यातेलय' याति `
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ae (३४) | fag aca तत्तस्मात्सर्व जगज्जन्म स्थिति | ध्वंसकारणत्वात् AM AJAVAT वस्तु परिच्छेद शून्य | maT ज्ञातृ ज्ञेयादि गिभाग
„ शुन्यं अस्पिभत्रामि अहं नह्मणोऽदागन्तः ISI प्रपञ्च से XSTU वतां कर इस समय संसार का जन्म
पालन तथा नाश का. कारणत्व अपने मे द्वी हे ऐसा कह रदे
है ॥ मय्येच सकल मिति मेरे में दी सम्पूर्ण भूत भौतिक प्रपञ्च
का समूद उत्पन्न होता है मेरे में दी arga जगत्प्रतिष्ठित अति- | स्थिति को प्राप्त होतां है मेरे में दी सम्पूर्ण चराचर विनाश |
— eÉ me ea e
को प्रात-द्वोता Š तिस कारण देशकाल वस्तु परिच्छेद से शतय अद्दयज्ञातृशेय आदि विभाग से tka ag ब्रह्म बह्म के जानने वाला में हैँ ॥ १६ ॥
| | ब्रह्मणा जगज्जन्म स्थिति sqa कारण |
. स्वाज्जगदाकारत्वेन विकारित्वं sta तदे तदति , दुबोध स्वरूपत्वेन वारयति ॥ `| अणोरणीयान हमेव तहन्महानहं बिश्व |
मिदं बिचित्र पुरातने ऽहं पुरुष 5हमोशोंहिरणम- | Asemka रूपसस्मि || २० ॥ . | अणोस्णीयानिति अणोरण परिमाणात;
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शरणीयानति शयेनाणुः जगत्कारणभूते5हमेव आह प्रत्यय॒ ब्यवहारयेग्येनत्वन्ध: । तद्वत्. यथाणुस्तथासहान्लवस्माद प्यधिकः WE व्या- gaa झणीयसां महतं कारणानांच यथाभेदः तथा तवापि स्यादित्यतआह बिश्व fac सा-' Ret qa भौतिक प्रपञ्च जातं अहं व्याख्या अस्य जगत स्तत्वादुमेदरादित्ये खस्मोदप्यभेद aaa आह विवित्रं विविध स्वयम नन्त सेद afgan तदभिन्मस्य तस्य तबा प्यांधानुकिल्डां स्यादित आह पुरातनश्चिर am आधुनिक act धारा sr बढ, सूत्र त्ञादः भिन्न चिरंतनीरज्जु खिऽह व्याख्यातं ü पुरुषः परिपणे aga अह व्यांख्यातमरिद्यां दशांयानीशः नियन्ता |] नियन्तुस्वेलार्म॑थ्य माह ` हिरण्मयः ज्ञानप्रचुर तस्प्रधानोवाऽऽदित्यस्थः
संकाय कारणारमाह व्याख्यातं शिवरूपं. ` >: ATS, SIRA ARERIA bot? rbhcangoti
eve (३६) ` ज के जन्म पाछन नाश फे कारण होने से तथा जगदो- - कार होने से बरहम में विकारिस्ष चर्म प्राप्त होता है उसको अति gata स्वरूप दिखा कर चारण करते Š अणोरणीया निति जगत का कारण अह प्रत्यय ब्यवहार के योग्य में ही अणु से भी अणु अतिशय सूदम रूप हूँ दूसरा नही' उखी प्रकार सबसे
अधिक मद्दान भी Š É ॥ शंका दोती Š कि ॥ अण॒ और महान `
-का जिस प्रकार भेद Š वेसा ही आपका भी भेद दे खमांधान
करते Š ॥ अविद्या के सहित विचित्र जगंत मैं Psu sla
- और ब्रह्म का अभेद होने पर संसार से भी अभेद प्राप्त होता
———
है ता भी वि.बिघ अपने आप अनन्त भेद यारा है संसार के | अन्त: पाती संसार से अभिन्न जीव का भी आधुनिकत्व प्रा `
होता Š ॥ यदद शंका देने पर समाधान करते हैं II पुरातन चिरन्तनः ॥ पुराना है जिस प्रकार आरोपि SQ पानी की "थोरा घळी a सूत्र से रस्सी पुरानी है वैसे दी आत्मा संबं ग्रपञ्चो से पुराना है पुरुष परिपूर्ण रूप Š ॥ ईश सबका नियम न करने वाला है वह नियमन अविद्या दशा में जानना चाहिये बिद्या दशा में at नियस्पनियन्ता के अभाव होने से देश कहना नहीं बनता. नियन्तृ: नियन्तृत्व साराथ्य को बताते है ॥ दिररमय:॥ बहुत ज्ञान वाले ज्ञान जिनमें मुख्य हैं ॥ आदित्य मण्डल में , वर्तमान GER कारण स्वरुप Ruang पुरुष में हूँ इंसंलिये “नियम न करने मे. सामथ्यं आत्मा को Š । तथा शिल स्वप "मंगळरूप में Ë ॥ २० ॥ a
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( ३७ )
स्वस्याह ||
अपणाणिपादोऽहमचिन्त्यशक्तिः पश्याम्य aq ःसश्चणोस्यकणः ॥ अह' विजानामि AR- RSU नचास्ति बेचा मम चित्सदाह' ॥ all.
अपाणि qta; पाणिप!दहीनः ae’ sat gaa मचिन्त्यशक्तिः दुवोधशक्तिः एवं भूतोपि जवनोग्रहीतेत्यथः ॥ पश्यामि बिविधं wasa जात सव गच्छामि ú अवलोकयामि TAG aqa स gages श्रृणोमि वणां
करामि अकर्णः कर्ण रहितः अहः व्याएयातं `
विजानामि विविधं प्रपञ्च जातमवगच्छामि - विविक्तरूपः बुद्ध्यादि gaa न चास्ति
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इदानी. सवे कारणहीनस्य सर्वज्ञतां
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नास्त्येव वेत्ता कमे कतु भावेनावगर्न्ता समानं- -
aaa भेद रहितस्य eet प्रकाश बाध स्वभावः सदा dtg व्याख्यातं ॥ २१ || - 3a ब्रह्म से भिन्न ate दशा तथा श्रोता नहो ह इस अ ति
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tangan ही लेकर इस wear मै कदा गया हे सब साधन | “रहित होने पर भी उसको सर्वज्ञता है पाणिपाद से रहित भी |
BE पद घाच्य आत्मा है तो भी अचिन्त्य शक्ति हे डलकी शक्ति | ` का ज्ञान बहुत कठिन हे.॥ अपाणि पांद् होता हुआ भी वेग से | ` चलने वाला हे चक्ष् र दित है ते भी देखने वाळा है कान Í
नही' हैं तो भी घह आत्मा सुनने वाला हे चुदुध्यादि से प्रथक | * रूप जिसका है ऐसा आत्मा सब कुछ जानता है कमी TT रूप
से वेचा जानने वाला नहीं है आनन्द स्वरूप भेद रहित सदा ` चित्स्वय' प्रकाश वोध स्वभाव सदा चित्स्वरूप मे' हैं ॥ २१॥
इदानीं सर्ग शास्त्र प्रतिपापस्थाःत्मनः ' 5 - सव विकारा भागां दश् षति | sat
वेदेरनेकेरहसेव्वेद्योनेदान्तर ahs ñ. “देव sm ॥ २२ ॥ वेदैः ENR. बहुसिरहमेव व्याख्यातं ॥ वेद्यः प्रति पाद्यः lI वेदान्त सूत्र कुद्दंदबया सरूपः वेदनिद्ठे दान्त Sa विशेषणं ॥ वेदानां झाडाना ॥ सांख्य विद्यास्थानानां वेत्ता वेदवित् स एव नत्वन्यः - वशुब्दादनेकलपः सम्पन्तश्चाह व्याख्यतप्
ats विभूतिमत्सत्वेष्विदतेव प्रधान मिव्युक्त
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aot (३३) es इस समय सम्पूर्ण वेदान्त शास्र के प्रति पाद्य आमा का ` मस्त विकार के अभाव को दिखाते है ऋग्वेद आदि समस्त ` ma से में दी àw Fy laea का रचने चाला वेद् व्यास मैं - Qé अ'ग सहित सम्पूणं वेद् बिद्या का जानने वाळा भी मै हूँ male वाले जितने .सत्व हैं उन सबमे वेद विद्या का विज्ञान ही प्रधान हाता है यह ga मन्त्र से कदा गया है॥ २२॥ नपुण्य पापे मम नास्ति RISI न जन्म देहेन्द्रिय खुद्धिरस्ति न भूमिरापा सम वन्हिरस्ति न aaa मेऽस्ति नचांवरं च एवं विदित्वापरसा- तमरूपं gage निषक्लमद्वितीय U २३ ॥ न पुणय पाऐमस नस्पृशत इतिशेषः॥ नास्तिनाश्ः विनाश न विद्यते ममेत्यनुषंगः U न जन्म 'जनिन समनास्तीस्यचुषंगः I| देहेन्दिय बुद्धिः ` 'देहश्वेंद्रियाणि च qaqaq देहेन्त्रिय जुः. 'नास्ति.न Ral सतेत्यनुषंगः ॥ न afa UNA ॥ एथ्वी सोदका समनांस्तीत्यनषंगः || वन्हिः. परि+. शति. बिते. ATG
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(४०)
नचाश्लिमेडस्ति laga मम न विद्यते ॥ `
चका[राद्वायबीयकायसपि न ॥ नर्चा aine मरिसम नास्तीत्यचुषंगः ॥ Tangan काय... तब्द्यांतरिकिंऽनुक्तांभावाथस् एवं उक्त प्रकारेण विदिरवासाचात्कृस्यपरसात्मरूप उत्कृष्टा .नन्दास्मस्वरूप' शुहाशय' बुद्धिशयानं निऽङलं AJI प्राणः ware बाय. ज्योतिरापः
थ्वोन्दिय' Asa वीर्यीतपःमन्त्रोः कर्मलेका नाम इतिप्रश्नाकाः sara अद्वितीयं सजातीय बस्तुशून्य' ।|२३॥ | ET
... BAR पुण्य-पाप नहीं है मेरा जन्म और नाश नहीं है देरेन्द्रिय भी मेरे नहीं। `
पृथ्वी 'जळ अग्नि वायु आकाश इनके ata मेरा कोई सस्बन्ध नहीं है इस प्रकार समझ कर-॥ निष्कळ अद्वितीय . अंश रहित एक हृदय रूप गुफा में रहने चाळा जो परमात्मा का रुप उलको। प्राप्त हाता Š ॥ पुनः इस मत्र का Prag. झर्थ
करते हैं अपने अपने कार्य को साथ पृथ्बी जल अग्नि वायु? . आकाश मेरे री दे, असंगः बस "प्रकार पने पकी ¦
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साक्षात्कार करफे उत्कृष्ट आनन्द स्वरूप परमात्मा छुः जा रूप बुद्धि में बतमान है निष्कल है प्राण श्रद्धा आकाश घायु ज्योति जळ पृथिवी इन्द्रिय मन अन्न aid तप सन्त्र कमं लोक नाम इतनी कलां जिसमें नहीं Š सजातीय विजातीय भेद से शल्य ऐसे पके ब्रह्म को प्राप्त द्दोता Š ॥ २३॥
समस्त साचि'सइसरि होनं प्रयाति शुद्ध परमात्म रूप || २४ ||
समस्त साच्चिमिति समस्त aga ` सव cat सदसहिहीन भावाभाव वजित | तदेव निवेद्य॑ गच्द्रतीत्याह प्रयाति शुद्धं qr ARA रूपं स्पष्ट ।
0 रूयका दशा भावाभाव से रहित शुद्ध निर्दोष उस पर- ARA स्वरूप फो ज्ञानी प्राप्त हाता Š ॥ :४॥
qiga परमात्मानं प्रतिपत्त मशुक्त्या5 _ शुद्धान्तः करणस्यान्तः करण शुद्धयर्थमाह |
यः शतरुद्रियमधीतेसे।डग्निपूता भवति « ` ` स॒ वाथ एता भवति सुरापोनत्यृताभवति ब्रह्म
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हत्यायीः ger भवति सुवर्णास्तेथात्यूताभवति कत्या कृश्यारपूतेःमवति तस्माढविसुक्त माशितो भवत्यन्त्याभ्रमी सवदा AEE वा जपेत् अनेन ज्ञोनमाप्नोति सांसारार्णवनाशनं j तस्सादेचं | विदित्वेनं Aa फलमश्नुते Ka फल |
) मश्चुते इति ॥ २५ Il
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यः प्रसिद्धो सुसुक्ष र्नुत्पन्नसाच्ात्कारः | शतरुद्रियं नमस्ते इत्यादि रूप रुद्राध्यांयमधीते पठति यथा शक्तिः स शतरुत्रियाध्ययनक्षर्ता अग्निपुता अग्निभिः शोतस्मातेः ga: g पवित्री झुंतोभवति वाय पूतो भवतति स्पष्ट सुरापानात् मदिरा पानान्महा पातक NA तोभवतीति स्पष्ट' ब्रह्म हत्या रूपात् महापातक | ` दोषात पूतता भवतांत स्पष्टं कृस्योकृत्यात् कृत्यं | करणीय' बुढिधपूर्वक पाप [| अकृत्य अकरणीय' | Bales पूवकं पापं ॥ दृत्य'च अकत्य' च॒ कस्या कृत्य TARGA भवतीति स्पष्टं ॥ aan
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तरुदिया ध्यनात् अविसुक्त विशेषेण शाई) क्ता चारान्मुक्ताः रहिताः Aga: पशवस्तेभ्पा व्यतिरिक्तेऽविसुक्तः पशुपतिः aata भव- तीति स्पष्ट अन्त्याश्नमी अन्त्याश्म उक्त: परमहंसस्य GAT स यस्या स्तीति अन्त्याः शमी सवंदो निरन्तरं amga कदाचिदुवा दिवसे दिवसे एक बारसित्यर्थः (| वा शब्दा ५ विकारि लामर्थ्यानुसारेण व्यवस्थितः विकल्पार्थः अनेन रुद्वाध्याय जपेन Haws ब्रह्मास्मीति साक्षात्कार रूपं प्राप्नोति ॥ संलाराणंबनाशुनं | सांसार सागर सोषणां यस्माद्र द्राध्याय जपो | वेश्.पाप RRUAN ह्म ज्ञान हेतुः तस्मा-
- त्ततः एवं विदित्वा उक्तेन प्रकारेण त्रिनेत्रध्या- नरुद्रा घ्याया ध्यनांदिना विदित्वा are: THUY एनं WHA Hard केवलस्यात्मना
` सवः Sasa तत्फलं पुरुषाभिलाष विषय aš `
KUN अगनुते, प्राप्ताति Sasa x 3 ° "an
(४४)
TAIJA ध्यांख्यातं || पदांश्यास उपनिषदः
परिसमाष्लथ: ॥ २५ ||
ऐसे परमात्मा को जानने को अशक्त. अशुद्ध अन्त;करण जिसका है उलक्के अन्तःकरण की s fz के लिये कहते हैं
जो मुक्ति का चांदने वाळा प्रसिद्ध तथा उत्पन्न सात्तात्कार जिसको नद्दी' है ब्द शत रुद्रिय नमस्ते इत्यादि रूप aaraa को यथा शक्ति पढ़ता Š बह शत रुद्रिय का पढ्ने चाळा केवळ पढ्ने छे ही श्रौत ema aft से aga कर्म के द्वारा जैसा पवित्र होता है darat सुन्द्र पवित्र किया जाता है वायु ले पवित्र होता है यह अथे स्पष्ट Š । ब्रह्म दस्या रूप महा पातक दोष से भी पवित्र होता Š gad चुराने के पातक से gaar Raiga और अब्नुद्धिघ पूर्वक अथात् जान कर और न जान कर SUG fat जाते Š उन सबसे शन ka के पाठ करने {i से झूट जाता Š । शास्र मे कहे इए आचारों खे विशेव रूप से | जो रहित हैं वे fage कहे जोते हैं चे सब पशु हैं उनसे भिन्न अविपुक्त कद; जाता है घह पशुओं का पति शासन करने चाळा है उस शासक के थमे को प्राप्त होता है ओ रुद्रा ध्याय का पाठ करता है अन्त्याथप्री अर्थात् जिनमें परमहंस का लक्षण पाया जाता, है qg कहे ज्ञाते हैं. सब ya निर्तर एक घार अथवा कभी कभी यथा अवसर दिन मै पक बार अथवा दे..घार अपने TRR के अनुसार इल रुद्रा ध्याय के पाठ Q aa €“
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| ` व्रकार साक्षात्कार रूप ज्ञान को प्राप्त ! हेता है Ar ae gate, 1.
रूपी समुद्र को सुखा देने बाळा दे जिल कारण से रद ध्याय का जप अशेष पापों की Fgh के द्वारा ब्रह्म जन को कारण
हैँ तिज कारण से ऐसा समझ कर Pras शिव के ध्यान दवारा परमात्मा को द्वी साक्षात्कार करके परमात्म रूप केवळ मुक्ति फळ को प्राप्त करता है जिसमें जीवां के सम्पूर्ण अमिळायाये' समाप्त हो जाती Š अन्त में पद की दे! बार aah उपनिषदु
की समाप्ति के लिये दे ॥ २५ N
| | इति श्री केवल्यापनिषदः शीमच्छेकरा-
नन्द स्वामि ARa ARa टीकायाः यम नियम प्राणायाम निष्ठयाभि वय भीमदानन्दा
Lo sm स्वामिविनिनि ता. भाषानुवादस्लमाति
Š | मयादोस् शान्तिः
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: | से पिसुखिनः सन्तु । सन्तु सवे निरा मयाः ` |
ad चिरायुषः सन्तु | पठन्तोभक्तिमाप्नुयु; ॥ `
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